Tuesday, August 22, 2017

शिक्षा और ज्ञान 116 (आरक्षण)

Rakesh Jha कभी रहा होगा मामला 98-38 का अब बस 98-96 का है। वैसे परीक्षा के अंक किसी के ज्ञान और सामाजिक सरोकार के द्योतक नहीं होते नहीं तो इतने पकड़े गए आईयस-आईपीयस-सेना के अधिकारी भ्रष्टाचार और कदाचार के मुदमें नहीं झेल रहे होते, जो नहीं पकड़े गए उनकी बात अलग है। यदि ऐसा होता तो पीपी पांडे और बंजारा जैसे आईपीयस संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हुए दंगे रोकने के बजाय, शासकों के प्रति निजी वफादारी में दंगे और फर्जी मुठभेड़ न करवाते। तमाम पढ़े लिखे लंपट नफरत फैलाकर मुल्क तोडंने की कोशिस न कर रहे होते। साइंस का विद्यार्थी परीक्षा में नंबर के लिए हनुमान का प्रसाद लेने न जाता। खैर, 2014 में अपने कॉलेज मे मैं विभागाध्यक्ष था और 96.5-94.5-92.5 (जनरल-ओबीसी-यससी और यसटी) कट-ऑफ पर पहली ही लिस्टमें सभी कैटेगरी में 2-2 गुना से ज्यादा ऐडमिसन हो गए, बहुत से आरक्षित कैटगरी वाले जनरल में भी। अभी क्या हो रहा है कि हमलोगों के घरों के बच्चे आरक्षणृआरक्षण चिल्लाते हुए पढ़ना-लिखना छोड़कर लंपटता करते हैं तथा हमलोगों के घरों की लड़कियां और दलित लड़के-लड़कियां नए नए अवसर से वंचना की यादों को धूमिल करने के प्रयास में नगन से मेहनत करते हैं। मैं मई में गांव गया था। चाय के अड्डे पर आरक्षण का रोना रोया जा रहा था। मेरे गांव में दो इंजीनियर हैं। दोनों ही हमारे सहपाठी जयराम (जम्मू) के बेटे। एक ने आईआईटी से पढ़ाई की। जयराम अकेला दलित है हमारे समकालीनों में जिसने प्राइमरी तो पास ही किया, मिडिल तक भी पढ़ाई की। मैंने उन दिग्भ्रमित युवाओं से पूछा कि चलो आरक्षण से एक लड़का आईआईटी में चला गया कोई बिना आरक्षण वाला किसी रीजनल कॉलेज तक क्यों नहीं पहुंचा? और कहा कि बच्चों 15 फीसदी के लिए 51 फीसदी अनारक्षण है ही और आरक्षण का रोना रोने की बजाय पढ़ें-लिखें। लेकिन लंबे समय का दुराग्रह एक भाषण से खत्म हो जाता तो क्या बात थी?

फुटनोट 116 (खलीफा)

1987 में राज्य सभा में राही मासूम रजा के भाषण के अखबारों में छपे अंश उस समय पढ़ा था। Kumar Narendra Singh और Chandra Bhushan दोनों ही मित्र कही हैं। खलीफा खुदा के सामने उसके बंदों का प्रतिनिधि होता है, लेकिन बंदों का निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उसका निर्वाचन भी पोप की तरह होता था। वह तलवार के बल पर भी खलीफा या अमीर बनता था जैसा कि कर्बला के युद्ध से साफ लगता है। एक शोध के सिलसिले में (1987), फिर जिया-उद्-दीन बर्नी के राजनैतिक विचारों के पढ़ाने के लिए, इस्लामी राजनैतिक चिंतन पर थोड़ा-बहुत अध्ययन किया. राजशाही गैर-इस्लामिक है इसीलिए सुल्तानों को खलीफा से मंजूरी लेनी होती थी जो बाद में औपचारिक रश्म बन गयी और फिर खत्म। हिंदुस्तान के मुगल शासक किसी खलीफा की संस्तुति के मोहताज नहीं थे। हां धार्मिक और राजनैतिक सत्ता एक ही हाथ में रहती थी।

बिना लड़े कुछ नहीं मिलता

बिना लड़े कुछ नहीं मिलता
हक के एक-एक इंच के लिए लड़ना पड़ता है
यह जो कवि आरती है
लड़कर ही यहां तक पहुंची है
किया विद्रोह पहले पढ़ने के लिए
और की पढ़ाई
हक़ की दावेदारी तथा जुल्म से लड़ने के लिए
विद्रोह सर्जन की पूर्व शर्त है

उसकी बेबाकी संस्कारों की नहीं
उन्हें तोड़ने के साहस का नतीजा है
लोग जब इंतजार में थे
पाजेब के घुंगरुओं की टुन-टुन की
बना लिया तोड़कर पाजेब उसने झुनझुना
जब आगोर रहे थे बड़े-बुजुर्ग
घूंघट में मुंह ढककर करेगी चरणस्पर्श
उसने आंचल को फाड़कर बना लिया था परचम
जानती है वह यह ऐतिहासिक सच
हार-जीत है तमाम संयोगों का नजीजा
अहम है लड़ाई की गुणवत्ता
इसीलिए एक हार से वह मायूस नहीं होती
कलम पर चढ़ाकर शान
मुक्ति के अगले मोर्चे के लिए
विचारों के और असलहे जुटाती है
आज़ादी के नए नग़्मे लिखती है
क्योंकि वह जानती है
बिना लड़े कुछ नहीं मिलता
हक के एक-एक इंच के लिए लड़ना पड़ता है
(ईमि: 23.08.2017)

मार्क्सवाद 72 (16 घेटे की मजदूरी)

8 घंटे काम करने वाले चपरासी का इंजीनिय बेटा इसलिए 16 घंटा काम करता है कि इंजीनियर बेटे को थोड़ा ज्यादा रकम देकर पूंजीपति उसका सारा समय खरीद लेता है और एक इंजानियर से 3 इंजानियर का काम लेकर 2 इंजीनियर बेराजगार रखता या बनाता है। और जिसे रखता है उसे मशीन बना देता है उसके पास जीने का वक्त नहीं बचता, आजादी-गुलामी के बारे में सोचने के वक्त की बात ही छोड़िए। 2 नौकरी न होने से नौकरी की तलाश के अलावा देश-दुनिया के बारे में सोच नहीं पाते और एक नौकरी होने से नौकरी के अलावा कुछ नहीं सोच पाता।

शिक्षा और ज्ञान 115 (नेहरू)

Sanjay Srivastav मित्र, हम सब ज्ञान के सहकारी अन्वेषण में लगे अज्ञानी-अल्पज्ञानी हैं, क्योंकि कोई अंतिम ज्ञान नहीं होता कि हम उसकी चोटी पर खड़े होकर नीचे लंबी ढलान देखकर आत्मविभोर हो नाचने लगे कि हम ज्ञान के एवरेस्ट पर पहुंच गए है। ज्ञान एक निरंतर प्रक्रिया है, हर पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की उपलब्धियों की बुनियाद पर नई मंजिलें खड़ी करती है। तभी तो हम पाषाण युग से साइबर युग तक पहुंच सके हैं। अंतिम ज्ञान की दावेदारी या किसी अज्ञात स्वर्णिम अतीत में उसकी तलाश, भविष्य के विरुद्ध एक इतिहास-विरोधी साज़िश होती है, जो कभी-कभी कामयाब भी हो जाती है। लेखिन अंततः इतिहास आगे ही बढ़ता हैें। सबके पास कुछ-न-कुछ प्रकृतिदत्त प्रतिभा होती है जो उचित अवसर के परिवेश में निखरती हैं , वे भिन्न होती हैं, ऊंच-नीच नहीं। उन्हें ऊंच-नीच समाज बनाता है। पांचों उंगलियों के मुहावरे के पैरोकार यह नहीं बताते कि द्रोणाचार्य को एतलब्य की सबसे छोटी उंगली, अंगूठा ही क्यों सबसे खतरनाक लगा था?नेहरू यह लेख तो शुद्धतावादी क्रांतिकारियों के दक्षिणपंथी विचलन के आरोप का खतरा मोल लेते हुए, नेहरू के उपहास के तड़के के साथ 15 अगस्त के मोदी के भाषण की भक्तों की फेसबुकी जय-जय की भावुक प्रतिक्रिया में लिखा गया। चूंकि भावुक प्रतिक्रिया थी, इसलिए यह एक तरह से नेहरू पर आरोपों का जवाब हे गया इसलिए नेहरू के आलोच्य पहलुओं पर ज्यादा ध्यान नहीं गया; इसलिए भी कि इसके लिए समुचित शोध और विश्लेषण की जरूरत है, जिसका फिलहाल वक्त नहीं है। कभी मिला तो थोड़ा शोध के साथ इसे ज्यादा प्रामाणिक बनाने की कोशिस करूंगगा। कभी समय मिला तब!

knowledge and Education 39 (Questioning...)

@ Kunwar Arindam Singh Chauhan & @ Barun Barnwal, thanks a lot for remembering and liking my sentences -- "Key to any knowledge is questioning; questioning anything and everything beginning with one's own mind set constructed by acquired values independent of the conscious will, i.e. by acquired moralities. The acquired moralities must be questioned and replaced by the rational moralities. But the unceasing process of questioning involves the risk of turning into atheist, as nothing is beyond the cause-effect paradigm. Knowledge does not come from what is taught but from questioning what is taught".

These were the introductory sentences of a book review (Socialism: Utopian and Scientific by Frederick Engels)submitted for a course, 'Socialism: Theory' taught by famous Political Scientist, Sudipta Kavuraj (then a young Associate Professor at JNU) I wish I had preserved them. I have atrociously bad sense of preservation and also had the acquired lack of self-belief of being a writer. ever since I repeat these sentences in my classes, whenever I got the opportunity to teach.

फुटनोट 115 (1942)

एक ग्रुप में 1942 में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका पर विमर्श में कुछ कमेट्स का संकलन।

सबसे पहली बात तो यह समझ लेना चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टी को अंघ्रेजी सरकार सबसे खतरनाक मानती थी, दो बार पूरी पार्टी पर मुकदमे चले. मेरठ केस में तो 2 अंग्रज कॉमरेड भी बंद थे। दूसरी बात जब हम इतिहास बना रहे होते हैं और जब लिख रहे होते हैं या पढ़ रहे होते हैं तो स्थितियां अलग अलग होती हैं। आज हम जानते हैं कि 1942 में सीपीआई के युद्धविरेोधी और बाद में युद्धसमर्न स्टैंड से युद्ध पर कोई असर नहीं पड़ने वाला था और उसे 1942 के आंदोलन में शिरकत करना चाहिए था, जो कि पार्टी उसके बाद मान चुकी थी। आज हम जानते हैं कि 1942 में सीपीआई के युद्धविरेोधी और बाद में युद्धसमर्न स्टैंड से युद्ध पर कोई असर नहीं पड़ने वाला था और उसे 1942 के आंदोलन में शिरकत करना चाहिए था, जो कि पार्टी उसके बाद मान चुकी थी। सोचिए यदि हिटलर सोवियत संघ पर हमला न करता और लाल सेना उसके अहंकार को न चूर करती तो इतिहास और भारत का इतिहास क्या होता?