Thursday, February 22, 2018

लल्ला पुराण 183 (राम)

Shailendra Singh बाल्मीकि के शूद्र होने की बात ब्राह्मणो द्वारा फैलाई गयी किंवदंति है, जैसे कालिदास के मूर्खता की किंवदंतियां। जी, वर्णाश्रम की शुरुआत तार्किक श्रम विभाजन के रूप में हुई। कालांतर में ब्राह्मणों ने परजीवी वर्गों (सवर्ण) की प्रिविलिजेज अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करने और श्रमजीवियों की अधीनता को स्थाईभाव देने के लिए इसे जन्मजात बना दिया। यह काम अत्रेय ब्राह्मण की रचना तक (लगभग 1000 ईशापूर्व) हो चुका था। बुद्ध के समय तक जन्म आधारित वर्णाश्रम गहरी जड़ें जमा चुका था, बुद्ध का विद्रोह इसी विकृति के विरुद्ध था।

लल्ला पुराण 182 (धर्म)

Gitendra Singh धर्म पर मैंने अपना एक लेख इस ग्रुप में पोस्ट किया था, लेकिन ये पढ़ते तो हैं नहीं, नाम देखते ही इन पर वामी कौमी का भूत सवार हो जाता है। वेदांतियों में चारवाक हूं कविता में मैंने अपना परिचय दे दिया था। सीपीयम में घमासान (समयांतर, फरवरी) लेख भी शेयर किया था। जिन्हें ये वामी-कौमी कहते हैं, उन्हें हम वामी-कौमी मानते नहीं, वे हमें अराजक मानते हैं। लेकिन पढ़ने का धैर्य इनके पास है नहीं, ये जिल्द देखकर किताब की समीक्षा लिखने वाले लोग है। जिस तरह ब्राह्मणवाद कर्म-विचारों की बजाय जन्म की जीववैज्ञानिक दुर्घटना के आधार पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है, उसी तरह ये लोग जो लिखा है उसे पढ़कर, उनका खंडन-मंडन करने की बजाय, नाम देखते ही वामी-कौमी भूत से पीड़ित हो अभुआने लगते हैं। और कुछ नहीं मिलता तो कुछ युवा मेरे बुढ़ापे पर तरस खाने लगते हैं जैसे वे चिरयुवा ही रहेंगे? ऐसी विकृत सोच बच्चों के दिमागों में कहां से आती है? क्या हम उन्हें यही पढ़ाते हैं? धर्म पीड़ित की आह है, निराश की आश है, पीड़ा का कारण भी है, प्रतिरोध का संबल भी। धर्म खुशी की खुशफहमी देता है। किसी से धर्म छोड़ने को कहने का मतलब है उस खुशफहमी को छोड़ने को कहना है, लेकिन यह तब तक नहीं हो सकता जब तक खुशफहमी की जरूरत की परिस्थितियां नहीं खत्म होती। वास्तविक सुख मिलने पर खुशफहमी की जरूरत नहीं रहेगी, धर्म अपने आप अनावश्यक हो जाएगा। हमारा समाजीकरण ऐसा होता है कि हमारे अंदर आत्मबल पर अविश्वास बढ़ता है और दैविकता पर विश्वास। आत्मबलबोध वापस पाने के बाद इंसान को भ्रम की जरूरत नहीं रहती, वह कष्टों को तथ्यात्मक रूप से समझता है, दैवीय अभिशाप के रूप में नहीं। मेरी पत्नी का मानना है कि उनकी मनौती के चलते मुझे नौकरी मिली। मेरा क्या जाता है, अगर उन्हें इसमें खुशी की खुशफहमी मिलती है! लेकिन आत्मबल पर विश्वास की प्राप्ति के लिए कठिन और निरंतर आत्मावलोकन-आत्मसंघर्ष की जरूरत होती है। इसी दुरूह प्रक्रिया को मैं मुहावरे में बाभन से इंसान बनना कहता हूं, जनेऊ तोड़ना जिसकी पूर्व-शर्त है।
एक कट्टर कर्मकांडी ब्राह्मण बालक की नास्तिकता का सफर आसान नहीं था। मार्क्सवाद धर्म को नहीं, उन परिस्थितियों को खत्म करने की बात करता है जिनके चलते धर्म की जरूरत होती है, धर्म अपने आप खत्म हो जाएगा। इसी लिए हम ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जिसमें कष्ट ही न हों, कष्ट-निवारक की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। कई बार सरोज जी के फूल तोड़ने के लिए गुड़हल की डाल भी लटकाता हूं। देवी को लाल गुड़हल प्रिय हैं और इसलिए खिलते ही टूट जाते हैं। कभी कहता हूं देवी को संख्या से क्या मतलब, लेकिन आस्था के सवाल पर तर्क बेअसर हो जाता है।

लल्ला पुराण 181 (हिंदू)

हिंदू अरबों का दिया नाम और हिंदू धर्म एक फरेब है, क्योंकि हिंदू कोई पैदा ही नहीं होता कोई बाभन पैदा होता है, करोई चमार। बाभन से इंसान बनकते ही हिंदू धर्म निरर्थक हो दाता है। बाभन से इंसान बनने से इंकार करने वाले समाज करो रसातल में पहुंचाते हैं, समाजद्रोही देशद्रोही है।

आवाज दो हम एक हैं

जब मजदूर देता है
'आवाज दो हम एक हैं' का नारा
प्रतिध्वनियों से कंपित होता
अल्प्स से हिमालय तक का जहां सारा
जहां भी होता है
सत्ता के हथियारों से अत्याचार
चप्पे-चप्पे में गूंज उठते हैं
इंकिलाबी विचार
जिस दिन समझेगा मेहनतकश
पूंजी के छलावे की असलियत
ये लखटकिए शहंशाह हैं दरअसल
धनपशुओं की जरखरीद मिल्कियत
समझेगा वह गरीब वर्दीवाला भी एक दिन
सोचने के अधिकार के बदले मिवली वर्दी की हकीकत
नहीं बहाना है गरीब का लहू
किसी धनपशु के लिए
दिशा बंदूक की बदल जाएगी
बावर्दी और बेवर्दी मजदूर-एकता के लिए
धनपशुओं में मचेगी खलबली
भागेंगे बचाने जान
क्योंकि छोड़कर हरामखोरी
रोटी के लिए करना पड़ेगा काम
मजदूर-किसान के ऐसे राज्य को
मिला है समाजवाद का नाम
(ईमि: 22.02.2018)
(शुक्रिया नहीद कलम को आवारगी के लिए उकसाने के लिए)

बेतरतीब 39 (नास्तिकता)

नास्तिकता का दावा करने वाले जो लोग भगवान या भूत जैसी काल्पनिक अवधारणाओं से डरते है ढोंगी हैं, इनका भंडाफोड़ करना चाहिए। मेरी पत्नी अति धार्मिक हैं।रोज 2 घंटे (अतिशयोक्ति) घंटी बजाती हैं। मेरे विवि के आवास में भगवान का घर है लेकिन उस घर में मेरा प्रवेश निषेध। मैंने लाइटर रखना इसलिए शुरू कर दिया कि मंदिर की माचिस इधर-उधर हो गयी तो मेरी शामत कि मैं अपनी अपवित्र काया के साथ मंदिर में घुस गया होऊंगा, चप्पल पहन कर। 25-30 साल पहले गर्दिश के दिनों में किसी पेमेंट के इंतजार की बात बात शेयर किया। उन्होने कहा कि मैं भगवान को न लिर्फ मानता नहीं, उनके बारे में उल्टा-सीधा कहता भी हूं, इसीलिए तुम्हारे साथ गड़बड़ होता है। मैंने कहा कि भगवान इतना चुच्चा है कि मेरे जैसे अदना से आदमी से बदला लेने आ जाए, तो उसकी और ऐसी-की-तैसी करूंगा मेरा जो बिगाड़ा हो बिगाड़ ले। वह तो है ही नहीं तो बिगोड़ेगा क्या, भक्त जरूर झुंड की कायर बहादुरी में बिगाड़ने की नाकाम कोशिस करते रहते हैं। वह शिक्षक ही क्या जो "किसी भी" कारण से किसी भी छात्र के प्रति बदले की भावना रखे? ऐसा करते ही वह शिक्षक की पात्रता खो देता है। यही बात भगवानत्व पर लागू करें। यहां तो कोई भी फरेबी अपने को भगवान घोषित कर देता है, श्रीकृष्ण यदुवंशी से लेकर बाबा रामरहीम तक। मुझे धर्म से आपत्ति नहीं है वह खुशी की खुशफहमी देता है। आप किसी की परिस्थियों की खुशफहमी छोड़ने की मांग तब तक नहीं कर सकते जब तक उन्हें सचमुच की खुशी नहीं मिलती, मिल जाएगी तो खुशफहमी की जरूरत नहीं रहेगी, धर्म और भगवान अपने आप अंतरिक्ष के अनंत में विलीन हो जाएंगे।

फुटनोट 116 (उखंड राज्यविस्तार)

Rahul Kotiyal& प्रदीप सती : मुझे फक्र है तुम्हारा शिक्षक-मित्र होने का (चंद कक्षाएं ही सही)। उत्तराखंड आंदोलन के वेग के नए आंदोलन की जरूरत है, पिछले आंदोलन की परिणति प्रतिक्रांतिकारी साबित हुई। मैं कभी छोटे राज्य के आंदोलन का समर्थक नहीं रहा हूं। राज्य का आकार न तो मुद्दा है ल समाधान। नियोगी के नया छत्तीसगढ़ की तर्ज पर नया उत्तराखंड, जिसमें सामाजिक-आर्थिक विकास की अंतर्दृष्टि हो। बाद में विस्तार से लिखूंगा। मैं तुम्हारे संघर्ष में साथ हूं। वैसे यह भी विषयांतर के संघियों के अन्य शगूफों की तर्ज पर पर शगूफा ही है। लोग पलायन और पानी भूलकर प्रदेश की सीमा-विस्तार पर गर्व की अफीम में मस्त रहें और ये देशद्रोही पहाड़ की संपदा बेचते-नष्ट करते रहें। विस्तार से बाद में लिखूं। भावी आंदोलन महज पहाड़ की अस्मिता का नहीं, पहाड़ की संपदा के संरक्षण-संवर्धन की भी लड़ाई होनी चाहिए, पानी और पलायन की तथा वनों की विविधता का नया उत्तराखंड आंदोलन होना चाहिए। जय भीम--लाल सलाम।

बोझ तो फिर बोझ है

बोझ तो फिर बोझ है

बोझ तो फिर बोझ है
उतार फेंकना चाहिए
चाहे जिंदगी का हो
या परंपराओं के रूप में
पूर्वजों के लाशों की
जिसे हम ढोते आ रहे हैं
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
बोझ से दबा व्यक्ति
दौड़ने की बात क्या?
चलता भी है रेघ-रेघ कर
बोझ हंसकर उठाना नहीं चाहिए
उतार फेंकना चाहिएअट्टहास के साथ
जिंदगी को बोझ बनने से बचाने के लिए।
(ईमि:22.02.2018)
[कलम की यूं ही आवारगी]