Saturday, October 21, 2017

नवब्राह्मणवाद 29

कारण कुछ भी हो किसी से थूक कर चटवाना एक कुत्सित, घृणित और विकृत दिमाग की उपज है। पूर्वी उत्तर प्रदेश का दबंग यादव (खास कर मुलायम-अखिलेश के शासन काल में) दलितों के साथ वैसा ही सामंती-दमनकारी व्यवहार करते था जैसे पहले राजपूत दबंग। मैं कही-सुनी या आंखों देखी नहीं भोगी बात बता रहा हूं। 1991 में भाजपा उ.प्र. में मंदिर अभियान से नहीं मुलायमी कुशासन और यादवी गुंडागर्दी के विरुद्ध जनाक्रोश से जीती थी। जब भूमंडलीकरण पर स्टैंड लेने की बारी आई तो मुलायम-माया पैसे खाकर बैठ गए। बाभन से इंसान बनना तो जरूरी है ही, अहिर से इंसान बनना भी उतना ही जरूरी है।

ईश्वर विमर्श 44

Mohd Kamil मार्क्स भी पढ़ा है,  मैक्स वेबर भी। और निष्कर्ष यही है सारे धर्म फरेब हैं और कमजोरों की लाठी। संघियों-मुसंघियों में इस बात में कोई फर्क नहीं है। धर्म के नाम पर रक्तपात से इतिहास पटा है। सारे रक्तपात राजनैतिक होते हैं., धर्म महज औजार है, चतुर-चालाक लोग धर्म के नशे में चूर धर्मांधियों तो उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। सुकरात, गैलेलीयो, ब्रूनो सारी हत्यायें धर्म के नाम पर धर्म के कमीन ठेकेदारों ने की। मोहम्मजद साहब जिहाद में फूलवर्षा करते थे? लूट में मिले माल और औरतों का क्या करते थे? कर्बला में पैगंबर की विरासत के दावेदार एक दूसरे को फूल-माला चढ़ा रहे थे? 1923, 1933 में गाजे-बाजे और गाय-सूअर के नाम पर देगों में कितने इंसान कत्ल हुए? 1947 में धर्म के नाम पर कितना खून बहा? 1947में  अभूतपूर्व जनसंहार के साथ इतिहास का अमानवीय खंडन नास्तिकों ने किया कि कि धर्म की जहालत के ठेकेदारों ने? बाबरी विध्वंस और उसके बाद के दंगों में धर्म का कोई योगदान था? 2002 का गुजरात नरसंहार का तो आपके हिसाब से धर्म से कुछ लेना-देना  नहीं? मुजफ्फर-नगर शामली में धार्मिक उंमाद का कोई योगदान नहीं था?  राम-रहीम का धर्म-भगवान से कुछ लेना-देना नहीं है क्या? भारत-पाकिस्तान-बांगलादेश में जारी तर्कवादियों की हत्या में धर्म ती कोई भूमिका नहीं है क्या? धर्म के नाम पर उत्पात करने वालों और हैवानियत में क्या फर्क है? आईयस और तालिबानों का धर्म से कुछ लेना-देना है क्या? संघियों-मुसंघियों पर समय खर्च करना समय की बर्बादी है, क्योंकि उनके दिमाग मजहबी जहालत से ओत-प्रोत होते हैं। विदा लीजिए।

Friday, October 20, 2017

बेतरतीब 18 (शाखा प्रसंग 1)

शाखा संस्मरण 1

1968-69 जौनपुर के टीडी कॉलेज में 10वीं का छात्र था और गोमती किनारे बलुआ घाट पर कामता लॉज (प्राइवेट हॉस्टल में रहता था।उसी छात्रावास में रहने वाले, बीए के छात्र और साप्ताहिक रेल सहयात्री के साथ एक दिन कबड्डी और खो खेलने के लिए बलुआ घाट पर मंदिर के पताके की तरह झंडा गाड़े मेरे क्लास का बेनी साव के खानदान का लड़का शुभाष गुप्ता चौड़ा सा खाकी पैंट पहने, बाएं कंधे के बीच से लाठी थामे गंभीर मुद्रा में सामने खड़े 10-12 लड़कों को पीटी करा रहा था। पीटी का क्लास मुझे वैसे भी नहीं पसंद था। हमारे उपरोक्त सीनियर ने पहुंचते ही झंडे के सामने खड़े खड़े होकर सावधान की मुद्रा में खड़े होकर सीने पर हाथ रख कर सर झुकाया और पीटी स्टाइल में हाथ नीचे कर पीटीआई के निर्देश 'पीछे मुड़' पर प्रतिक्रिया की तर्ज पर पीछे मुड़कर सहज हो गए। मुझे भी वैसा ही करने को कहा, इसका कोई तर्क नहीं समझ आया लेकिन एक सम्मानित सीनियर की बात मैंने बेमन अनका अनशरण किया। खो और कबड्डी की खेलों के बाद पताके सामने सब सावधान मुद्रा में खड़े हो गए, सुभषवा ने पीटाआई की तर्ज पर 'ध्वज प्रणाम 1,2,3'  का आदेश दिया और सबके साथ मैंने भी उपरेक्त कसरत दोराया। उसके बाद चलते हुए सबको जी जी कह कर नमस्ते करने लगे। मुझे अजीब लगा मिलने पर सब एक दूसरे के अस्तित्व का संज्ञान न लेते हुए झंडे के साने खड़े होकर कसरत करते हैं और अलग होकर छोटे बच्चों के भी जी कहकर नमस्ते नमस्ते करने लगते हैं। अजूबे तो होते ही हैं, लेकिन इससे मेरे कर्मकांडी, सनातनी परिवार में मिले संस्कारों को झटका लगा जिसमें सम्मान और अभिवादन हाथ जोड़कर, चरणसपर्श या माथा टेककर अभिव्यक्त किया जाता है।

क्रमश: ...

Thursday, October 19, 2017

काजी-ए-अहमदाबाद

काजी-ए-अहमदाबाद ने फैसला दिया
नहीं छाप सकता द वायर काली करतूतों का कच्चा चिट्ठा
जुड़ा हो यह अगर किसी शाह-जादे से
हो जिस पर बरदहस्त रामजादों का
नहीं कर सकता वह
राज्य की गोपनीयता भंग
भ्रष्टाचार है हुकूमत का अभिन्न अंग
काजी-ए-अहमदाबाद ने फैसला दे दिया
लाश को किया जाएगा कारावास में बंद
बहस चलेगी कत्ल में हुई की कातिल की जहमत
और खंजर पर आए ख़म के हरजाने पर
(ईमि: 19.10.2017)

फुटनोट 139 (दीवाली)

Naveen Joshi साथी, जैसे-जैसे समाज में बाजार की पैठ बढ़ती गयी, उपभोक्ता संस्कृति का प्रसार होता गया उत्सवों का बाजारीकरण होता रहा। यदि मैं अपने बचपन के दीवाली के उत्सव के अनुभव सुनाऊं (सुनाऊंगा नहीं) तो भूमंडलीकरण की पीढ़ी को लगेगा कि दादी-नानी से सुनी कोई कहानी सुना रहा हूं। गांव में यह पर्व सद्कर्म की तरह मनाया जाता था। माना जाता था कि इस दिन जो काम कोई करेगा, वह साल भर करता रहेगा। इसलिए लोग दिन भर गाली-गलौच या कोई अहितकारी काम करने से बचते थे। 'मंत्र (जिसे मालुम हो) जगाया जाता था'। मुझे 'बिच्छू का मंत्र' मालुम था। मंत्र की हकीकत की चर्चा की गुंजाइश यहां नहीं है, हां मैं इतना मशहूर हो गया था अगल-बगल के गांवों के लोग सोते हुए गोद मे उठाकर ले जाते थे। यह इसलिए कि हमउम्र लड़के मेरी जासूसी करते थे कि मंत्र मैं कब जगाता हूं? कोई मंत्र होता तब तो जगाता? बिच्छू के मंत्र ने काफी जगह खा लिया। पटाखे और छुरछुरी को बारे में कोई जानता नहीं था। दियों और पकवानों का त्योहार था। शाम को गांव की अपनी-अपनी बस्ती में और दूसरी बस्ती के नजदीकी परिवारों में लावा-बताशा का आदान-प्रदान होता था। हम, बच्चे दिन भर दियलियां जुटाने, धोने-सुखाने, रूई से बत्तियां बनाने में लगाते थे और शाम को वन से ढाक के पत्ते तोड़ने जाते थे, ज्यादा दूर नहीं था, लेकिन बाल-सुलभ चर्चाओं के चलते हम घंटों में घर लौटते, डांट इसलिए नहीं खाते थे कि सालभर खाना पड़ेगा। पटाखे-फुलझड़ियां तो छोड़िए मोम बत्ती का भी प्रचलन नहीं था। 1967-68 में मैं जब शहर (जौनपुर) हाईस्कूल में पढ़ने गया तब पता चला कि शहर में दीवाली में आतिशबाजी भी होती है। स्कूल में बच्चे दीवाली के पहले ही पटाखे फोड़ते थे। मुझे अच्छा लगा। दीवाली की छुट्टी में घर जाते समय मोम बत्ती के कुछ डब्बे, पटाखे और फुलझड़ियां ले गया। खेत-खलिहान-घूर-बाग-बगीचे-देवी-देवताओं के निवास वाले पेड़ों, डीहों और उन पेड़ों के नीचे भी जिनमें किसी पूर्वज की आत्मा वास करती थी। उसके बाद सरस्वती (किताब का बस्ता) के पास दिया जलाकर कुछ देर किताब कॉपी लेकर बैठते थे जिससे साल भर पढ़ते-लिखते रहें।उस साल आस-पड़ोड के सारे बच्चे मेरे घर आ गए और पटाखे-फुलझड़ियों के चमत्कार का मजा लेने लगे। धीरे धीरे बाजार गांव में घुसती गयी और दीवाली का शहरीकरण होता गया. खरीफ की फसल खलिहान में पहुंचने के उत्सव के किसानों के त्योहार का शहरीकरण(बाजारीकरण) होता गया।ज्ञान पर धर्मशास्त्रीय वर्चस्व की लंबी प्रक्रिया के परिणास्वरूप किसानों के उत्सव में धार्मिकता के तत्व प्रवेश कर गए। दियों के इस पर्व पर धरती के सभी बासिंदों को हार्दिक बधाई