Sunday, June 4, 2017

फुटनोट 99 (हिंदू सहिष्णुता)

यह प्रमुखतः जाहिल-काहिलों; मुर्दापरस्त-बुतपरस्तों; वर्तमान से भटककर अतीत में गौरव खोजने की भंवर में फंसकर जाने-अनजाने भविष्य के विरुद्ध साज़िशकर्ताओं का देश है जिसे एक फिद्दी सी आबादी वाले मुल्क के कुछ बनिए गुलाम बना सकते हैं और शूर-वीरों को वर्दी पहनाकर गुलामों का चौकीदार। यह शूर-वीरों का ऐसा देश है जहां नादिरशाह जैसा चरवाहा कुछ हजार घुड़सवारों के साथ पेशावर से बंगाल तक लूट-पाट कर वापस जा सकता है। जिस समाज में ऊंच-नीच वर्गों में बंटे, अल्पसंख्यक अनुत्पादकों के वर्चस्व वाली वर्ण-व्यवस्था की आचारसंहिता का अनुपालन शास्त्रसम्मत राजधर्म हो, उसे ईस्टइंडिया जैसा कोई ताकतवर बनिया गुलाम बनाकर लूट सकता है। बच्चों को इतिहास पढ़ने से इसीलिए रोका जा रहा है कि कहीं उनके दिमाग में यह सवाल न उठे कि जब एक ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने मुल्क को 200 सास तक गुलाम बनाकर लूट सकती है तो 'मेक इन इंडिया' के लिए आमंत्रित सैकड़ों कंपनियां मुल्क का क्या हश्र करेंगी। यह सरकार रेल के निजीकरण और खरीददारी की तारीख पर आधारित किराये की सीधी लूट हो रही है और अब स्टेटबैंक ने तमाम मदों में सीधी डकैती कर रहा है। लेकिन हमारा समाज बहुत सहिष्णु है। वह हंसते हंसते लुटता रहता है और सोचता है राष्ट्र के लिए बलिदान कर रहा है। बस वह गाय के मामले में थोड़ा असहिष्णु है, संदेह में किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है, अखलाक से पहलूखान तक तमाम मिशाले हैं। इन नृशंष हत्याओं के प्रति भी हमारा समाज बहुत सहिष्णु है। कई सरकारें और पार्टियां तो गोबध को मानव हत्या से भी अधिक सजा के कानून बनाने पर विचार कर रही हैं। यह अलग बात है कि हमारे नेता जिन यूरोपियों और अमरीकियों का पलक पसार कर स्वागत करते हैं, उनका नियमित आहार ही गोमांस है। गाय के नाम पर हत्याओं पर कोई बड़ा हो-हल्ला नहीं, रेल की लूट पर कोई होहल्ला नहीं, किसानों की तबाही पर कोई देशव्यापी उद्गार नहीं। नोटबंदी में त्राहि-त्राहि मची थी लेकिन भक्तिभाव कायम थी। उत्तरप्रदेश में अराजकता फैली है लेकिन माहौल योगी-मोदीमय है। चुनाव में बंटे कंधों पर लहराते भगवा गमछों से तो ऐसा ही लगा। हमारा सहिष्णु समाज भक्तिभाव से ओतप्रोत है जिसमें विवेक की घुसपैठ, फिलहाल तो मुश्किल लगती है। जिन मित्रों को यह बात हताशा लगे, जरूर बताएं.

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